
दूर समुद्र में एक द्वीप था। वहां एक बुढि़या अकेली रहती थी। नाविक उस द्वीप को बुढि़या वाला द्वीप कहकर पुकारते थे। द्वीप ज्वालामुखी की चट्टानों का बना था। एक हिस्से में नारियल के थोड़े से पेड़ थे। वहां और कुछ भी नहीं उगता था। चट्टानें पानी के अंदर काफी दूर तक फैली हुई थीं। उधर से गुजरने वाले कई जहाज चट्टानों से टकराकर डूब जाते थे। कभी कोई भूला-भटका जहाज वहां ताजा पानी लेने के लिए लंगर डालता, तो बुढि़या उसकी सहायता करती।
बुढि़या को उस निर्जन द्वीप पर देखकर नाविकों को बहुत आश्चर्य होता। वे पूछते, “बूढ़ी मां, तुम अकेली यहां कैसे रहती हो?”
सुनकर बुढि़या चुप रहती। एक दिन किसी नाविक ने बहुत पूछा, तो बुढि़या ने बताया था, “कई साल पहले मेरा सारा परिवार जहाज में जा रहा था। हमारा जहाज इस द्वीप की चट्टानों से टकराकर टूट गया। सब डूब गए, केवल मैं ही बची। अब मेरा है कौन, जाऊं भी तो कहां?” फिर आंसू पोंछती हुई बोली, “और अगर मैं चली गई, तो आने वालों को कौन बताएगा कि ताजा पानी कहां मिल सकता है?”
एक बार द्वीप पर बारिश नहीं हुई। गड्ढों में भरा बारिश का पानी सूख गया। यह देखकर बुढि़या चिंतित हो उठी। सोचने लगी, ‘यह पानी तो मेरे लिए ही कम पड़ेगा। मैं यहां आने वाले नाविकों की प्यास कैसे बुझाऊंगी!’ उस रात बुढि़या को नींद न आई। बेचैन सी समुद्र तट पर टहलती रही। समुद्र का पानी चांदनी में चांदी सा चमक रहा था। एकाएक लहरों में हलचल हुई। बुढि़या ने देखा, लहरों से निकलकर कोई उसकी ओर आ रहा है। उसे आश्चर्य हुआ! कौन हो सकता है भला? कुछ डर भी लगा। तभी समुद्र ने निकला व्यक्ति उसके पास आ गया।
बुढि़या ने देखा, उस व्यक्ति के माथे पर चमकदार मोतियों की माला थी और हाथ में शंख। वह व्यक्ति बोला, “मां, मैं हूं समुद्र!”
“समुद्र! तुम समुद्र हो!” बुढि़या अचरज भरे स्वर में बोली।
“हां, मैं रोज तुम्हें देखता हूं। तुम दुख उठाकर भी, यहां आने वालों की प्यास बुझाती हो। मुझ में अथाह जल भरा है, पर मैं किसी की प्यास नहीं बुझा सकता। मैं तुम्हारा दुख समझ रहा हूं। मैं तुम्हें मीठा पानी लेने की तरकीब बता सकता हूं। मेरा पानी लेकर गरम करो। उसकी भाप को इकट्ठा कर लो। वह ठंडी होकर मीठे जल में बदल जाएगी।” समुद्र ने कहा और पानी में समा गया।
बुढि़या ने तुरंत मटके में समुद्र का जल लिया और जैसे समुद्र ने बताया था, वैसे ही करने लगी। जल को गरम करने से जो भाप उठी, उसे दूसरे मटके में इकट्ठा कर लिया। बाद में देखा, तो उस मटके में पानी नजर आया। उसे पिया और खुशी से नाचने लगी। सचमुच खारा पानी मीठे जल में बदल गया था।
बुढि़या हर दिन समुद्र के पानी से मीठा जल तैयार करके इकट्ठा करती। जब भी किसी जहाज के नाविक द्वीप पर आते, उन्हें पानी पिलाती।
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